"प्रणाम!" शेखर उनके दोनों पैरों को छूकर उनके चरण धुली को अपने माथे से लगते हुवे कहा।
तेजश्वी भवः। उन्होंने शीेेखर के माथे पर हाथ रखते हुवे कहा, तब घर पर सब लोग कैसे हैं?
सब ठीक है!
खाना खा लिए?
हाँ!
खाना खा लिए?
हाँ!
तब ठीक है।
दरअसल ओ उसके पिता तुल्य मौसा जी थे जो एक इण्टर कॉलेज के प्रधानाचार्य भी थे, उनके कॉलेज में उसे कुछ दिन पढाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।
शेखर को उस दिन 10th क्लास का क्लास टीचर के रूप में भेजा गया।
क्लास में जाते ही सभी छात्र खड़े हुवे, उसने सबको बैठ जाने को बोला। सभी छात्र बैठ गए, थोड़ी ही देर में उसने सबकी उपस्थिति दर्ज की और पढ़ाने के लिए किताब माँगी। तब तक एक हल्की सी आवाज शेखर के कानों में पड़ी.....
सर... अपना परिचय दीजिए!
उसने झट से उस चेहरे को ढूंढ निकाला जिसने ये बात पूछी थी।
सामने के ही ब्रेंच से एक लड़की ने ये बात कही थी वह बिल्कुल हक्का बक्का सा रह गया।
दूध सा श्वेत रंग, गोल मटोल चेहरा, बड़ी बड़ी और सागर सी गहरी आँखे जैसे मानो अपने भीतर हजारों राज छिपाए हुए हों, काले लम्बे बाल कमर तक छू रहे थें, उसकी आँखें कुछ कहना चाहतीं थी मगर जुबान साथ नही दे रहे थे।
शेखर ने अपने बारे में ज्यादा कुछ नही बताया क्योकि उसी स्कूल से उसकी बड़ी बहन भी पढ़ी थीं। उसने बस उनका नाम लेकर इतना बता दिया कि उन्ही का मैं भाई हूँ और शेखर का एक दोस्त भी उसी क्लास में था तो शेखर ने उसकी ओर इशारा करते हुए कहा कि मेरे बारे में अधिक जानने के लिए इनसे बात कीजिए।
इससे पहले शेखर को कभी भी ऐसा नही लगा था जैसा उस दिन लग रहा था आँखे बंद करता तो उसकी ही यादें और आँखे खोलता तो उसका ही चेहरा नजर आता जैसे तैसे रात कटी सुबह हुई।
अगले दिन उसे देखते ही शेखर का दिल जोर जोर से धड़कनें लगा ओ आँखें बंद करके सब कुछ भूल जाना चाहता था मगर ये संभव नहीं था। सायद उसे प्यार हो गया था। ओ उस क्लास में नही जाना चाहता था मगर लड़के उसे बुला ले जाते।
उस लड़की का भी पढ़ाई से ज्यादा ध्यान शेखर पर ही रहता था।
उसके साथ एक और लड़की थी जो ये समझती थी कि शेखर उसे पसन्द करता है मगर शेखर को तो कोई और ही पसन्द था
आखिर कार उसने शेखर के भाई 'जो उसी क्लास में पढ़ता था' से शेखर का नम्बर माँग ही दिया मगर उसने ये कह कर मना कर दिया कि उनका नम्बर मैं नही जानता।
एक रोज interval में शेखर एक क्लास में बैठ आँखे बन्द कर उसी के यादों में उलझा हुआ था की अचानक से एक आवाज उसने सुनी।
सर....
ये वही आवाज थी जो उसे आधा पागल बनाए हुए थी। उसने झट से आँखे खोली देखा तो वही लड़की सामने खड़ी थी हाँथों में एक बुक थी, होठों पर आशाएं, आँखों मे कुछ उमीद लिए,
क् क् क्या है। शेखर ने कहा मानो दिल की बात कण्ठ से बाहर न आ रही हो।
एक क्वेश्चन फसा था।
शेखर ने बुक अपनी हाँथों में लिया और सवाल हल करने लगा तभी उस लड़की ने कहा
सर... आपका नम्बर क्या है?
शेखर अवाक रह गया उसने कभी सुना था कि अगर किसी को सच्चे दिल से चाहो तो उसके दिल मे भी आपकी याद आती है मगर यहाँ ओ बात तो सच्च होती दिख रही थी।
उसने कहा क्यो?
कुछ बात करनी थी आपसे!
ठीक है इतना कह कर शेखर ने अपना नम्बर एक छोटे से कागज के टुकड़े पर लिख कर उड़के बुक में डाल कर दे दिया।
अगले दिन ओ लड़की फिर आई और बोली कि आपका नम्बर खो गया है , अगर आप बुरा न माने तो दुबारा अपना नम्बर दे सकते हैं।
शेखर ने कहा ठीक है बाद में दे दूँगा।
अगले दिन शेखर को अपने घर लौटना था ये बात पूरा स्कूल जनता था।
ओ लड़की सुबह से ही बिल्कुल उदास थी और उतना ही उदाश शेखर मगर करे तो करे क्या, इत्तेफाक तो देखिए कि उस दिन उस जगह पर भी कुछ टीचर जा कर बैठ गए थे जहाँ वे लोग रोज चोरी छिपे मिलते थे।
आखिरकार छुट्टी हुई सभी लड़के चले गए ओ और उसकी सहेली सबसे पीछे गए बस इस आस में की कहीं एक पल के लिए भी मुलाकात हो जाए तो नम्बर मिल जाता।
शेखर भी एक पल ही तलास रहा था हाथ मे एक कागज का टुकड़ा लिए की बस उसे दे देता मगर तकदीर को कुछ और ही मंजूर थी।
अंततः शेखर अपने घर को लौट आया। आते समय उसके साथ बस दो ही चीजें थीं, एक उसकी यादें और दूसरा ओ नम्बर लिखा कागज का टुकड़ा। पूरे रास्ते बस ओ यही सोचता रहा कि काश थोड़ी हिम्मत जुटा कर उसका नाम पूछ लेता।
दिन बीतता चला गया और उसके साथ साथ उस लड़की की यादें भी धुंधली होती गई।
एक दिन शेखर के मोबाइल की घंटी बजी उसने कॉल रिसीव किया मगर कॉल ड्रॉप हो गया उसने कॉल बैक किया तो उधर से एक आवाज आई
Hello..
ये वही आवाज थी शेखर की यादें बिल्कुल हरि भरी हो गई मगर इसके बाद फिर कोई आवाज नही आई। शेखर बहुत दिनों तक कॉल करता रहा मगर ओ नम्बर स्वीच ऑफ आता रहा।
शेखर की आखिरी तमन्ना अभी भी पूरी नही हो सकी उस लड़की का क्या नाम था उसे नही पता चल सका।
